जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकी देने के मामले में एक्टिविस्ट राकेश हांडू को हरियाणा के फरीदाबाद से गिरफ्तार किया गया है। हांडू पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और साइबर आतंकवाद से जुड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। कश्मीरी पंडितों को 7 अगस्त से लेकर 1 सितंबर तक उन्हें 3 धमकी भरे लेटर मिले थे। इनमें सिर्फ कश्मीरी पंडितों के नाम ही नहीं, घर का पता, गाड़ी का नंबर और रंग तक सब लिखा था। निजी जानकारी लीक होने के बाद कश्मीरी पंडित और डर गए थे। इसके बाद प्रधानमंत्री के विशेष रोजगार पैकेज के तहत नियुक्त सैकड़ों कर्मचारियों को करीब तीन सप्ताह तक छुट्टी पर भेज दिया गया था। उन्हें इस दौरान काम पर नहीं आने को कहा गया था। धमकी के बाद कश्मीरी पंडितों को वर्क फ्रॉम होम दिए टेलीग्राम चैनल के जरिए ये लेटर यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC) ने भेजा था, जिसे खुफिया एजेंसियां आतंकी संगठन लश्कर का मुखौटा संगठन मानती हैं। वे आतंकियों की प्रॉपर्टी जब्त किए जाने से नाराज हैं। ULC ने सरकारी विभागों और कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने का दावा किया है। इसके बाद सरकार ने कश्मीरी पंडितों को वर्क फ्रॉम होम करने के निर्देश दिए थे। 6,000 कश्मीरी पंडितों को सरकारी नौकरी मिली कश्मीरी पंडितों के लिए 2010 में शुरू किए गए विशेष रोजगार पैकेज के तहत करीब 6,000 लोगों को सरकारी नौकरियां दी गई हैं। इस योजना का उद्देश्य 1990 में आतंकवाद के कारण घाटी से विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों की वापसी और पुनर्वास में मदद करना था। 2022 में आतंकियों के हमलों में पांच कश्मीरी पंडितों की हत्या के बाद प्रधानमंत्री पैकेज के तहत नियुक्त कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए थे। उन्होंने सुरक्षा कारणों से जम्मू में तैनाती की मांग की थी। इस मांग को लेकर कर्मचारियों ने सात महीने तक प्रदर्शन किया। हालांकि, सरकार ने उन्हें जम्मू स्थानांतरित करने की मांग नहीं मानी। इसके बजाय कर्मचारियों को श्रीनगर और घाटी के दूसरे बड़े शहरों में तैनात किया गया। कश्मीरी पंडित बोले… ‘जब 6 हजार कर्मचारी ही सुरक्षित नहीं, तो हमारी वापसी कैसे होगी‘ 40 साल के साहिल रैना (बदला हुआ नाम) कश्मीरी पंडित हैं। वे अनंतनाग में रहते हैं और रेवेन्यू डिपार्टमेंट में काम करते हैं। साहिल कहते हैं, ‘सोशल मीडिया पर नाम के साथ ऐसी धमकियां देखकर डर लगता है। 90 के दशक में भी हमारे परिवार ने ऐसा ही दौर देखा था और हमें कश्मीर छोड़ना पड़ा था। अब हम सब फिर डरे हुए हैं। हम नहीं चाहते कि इतिहास दोहराया जाए।‘ ‘लेटर सोशल मीडिया पर किसने डाला, हमारी निजी जानकारी इनके पास कैसे पहुंच रही। सुरक्षा एजेंसियां इस बात का पता लगाएं। अगर लेटर फर्जी हैं, तो वो भी पता चले और अगर असली हैं, तो इनके पीछे कौन है, उसकी पहचान हो। क्या इन्हें पाकिस्तान से कंट्रोल किया जा रहा है, या कोई और है।‘ साहिल के मुताबिक, सरकार कश्मीरी पंडितों को घाटी में दोबारा बसाने की बात करती है, लेकिन PM पैकेज के करीब 6 हजार कर्मचारी ही अब तक नहीं बस सके हैं। सरकार घाटी में कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए 3 हजार मकान देने का दावा कर रही है, लेकिन कई परिवारों को वो भी नहीं मिला।’ साहिल गृह मंत्री से घाटी का दौरा कर कर्मचारियों और उनके परिवारों से मिलने की मांग करते हैं। वे कहते हैं, ‘हम सरकार पर भरोसा करके लौटे थे। घर छूटे 37 साल हो गए, अब पुनर्वास की प्रक्रिया तेज हो।’ ‘घर में छिपकर बैठे रहने से क्या होगा’ साहिल आगे कहते हैं, ‘प्रशासन घर से काम करने को कह रहा है, लेकिन इससे क्या बदलेगा। बच्चों को स्कूल भेजना होता है, बाजार के कई काम होते हैं और घर के बीमार या बुजुर्ग लोगों के लिए दवाइयां लानी होती है। ऐसे में घर बैठकर काम कैसे चलेगा।’ साहिल नागरिक समाज और NGOs से भी धमकियों की निंदा करने की अपील करते हैं। वे कहते हैं, ‘सरकार अगर सुरक्षा नहीं दे सकती, तो कर्मचारियों को सेल्फ डिफेंस के लिए लाइसेंसी हथियार और ट्रेनिंग ही दे दे।’ विस्थापित कश्मीरी पंडित बोले… ‘37 साल पहले छूटा घर, आज भी लौटने का इंतजार‘ जम्मू में रह रहे विस्थापित कश्मीरी पंडित राकेश कौल कहते हैं कि धमकी भरे लेटर 37 साल पुराने डर को ताजा कर रहे हैं, जिसने कश्मीरी पंडितों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। वे कहते हैं, ‘पहले अखबारों में कश्मीर छोड़ने और हमें गद्दार बताने वाले संदेश छपते थे, आज भी वही भाषा इस्तेमाल हो रही है।’ एजेंसियों को इन धमकियों की जड़ तक पहुंचना चाहिए। खासकर तब, जब लेटर में लोगों के नाम-पते तक लिखे हैं। कश्मीरी पंडितों के परिवार भले डरे हुए है, लेकिन धमकियों से उनका मनोबल नहीं टूटेगा। हमने 400 साल से ज्यादा का इतिहास देखा है। कश्मीरी पंडित न कभी झुका है, न झुकेगा। कौल दावा करते हैं कि आज भी कश्मीर में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो कश्मीरी पंडितों के वापसी का अधिकार समझते हैं। हालांकि कुछ लोग हमारी वापसी नहीं चाहते। इनमें धमकाने वाले लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने विस्थापितों की जमीन और प्रॉपर्टी पर पर कब्जा कर रखा है। वे कश्मीरी पंडितों के पिछले 37 सालों के विस्थापन को सरकारों के साथ-साथ समाज की भी नाकामी मानते हैं। कौल बार-बार दी जा रही धमकियों की जांच की मांग करते हैं। वे कहते हैं कि पता लगाया जाए कि इनके पीछे कौन है और उसका मकसद क्या है। —————– ये खबर पढ़ें… 35 साल पहले कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की फिर जांच:गांदरबल में महिलाओं-बच्चों समेत 23 को मारा था, ऐसे कई केस दोबारा खुले जम्मू-कश्मीर स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने 35 साल पुराने वंधामा नरसंहार की जांच दोबारा शुरू कर दी है। 1998 में गांदरबल के वंधामा गांव में 9 महिलाओं और 4 बच्चों समेत 23 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी। पूरी खबर पढे़ं…

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