चिप्स और कोल्ड्रिंक जैसे खाने-पीने के प्रोडक्ट में अगर आर्टिफिशियल स्वीटर यानी बिना कैलोरी वाली मिठास है तो कंपनी को पैकेट के सामने चेतावनी देनी होगी। इसमें लिखना होगा- ‘CONTAIN NON CALORIC SWEETENER यानी इसमें आर्टिफिशियल स्वीटनर मिला है।’ पहले यह जानकारी पैकेट के पीछे छोटे अक्षरों में होती थी। फूड सेफ्टी अथॉरिटी FSSAI ने सोमवार को यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में पेश किया।FSSAI ने कोर्ट को बताया कि, नमक-शकर या सैचुरेटेड फैट की लिमिट ज्यादा हुई तो पैकेट के सामने षटकोण लाल निशान लगाने का नियम सिंगल फेज में लागू होगा। पहले ये 2 फेज में लागू होने वाला था। बता दें कि आर्टिफिशियल स्वीटनर ज्यादा मात्रा में खाने-पीने से डायबिटीज और हार्ट अटैक जैसी गंभीर बिमारी का खतरा बढ़ जाता है। चैरिटेबल ट्रस्ट की जनहित याचिका पर एक्शन दरअसल, 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी नाम के एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर डिब्बा बंद या पैकेट वाले खाने पर वार्निंग लेबल लगाने की मांग की थी। इसके बाद से कोर्ट में सुनवाई चल रही है। 13 अगस्त की सुनवाई- जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने FSSAI को नियमों में देरी के लिए फटकार लगाई और पूछा कि क्या सरकार नहीं चाहती कि उसके लोग स्वस्थ रहें? 31 अगस्त की सुनवाई- FSSAI ने कोर्ट में हलफनामा पेश किया, जिसमें पैकेट पर षटकोण लाल वॉर्निंग लेबल अलग-अलग फेज में लागू करने का प्रस्ताव दिया। 10 सितंबर- बेंच ने FSSAI से पूछा दोनों चरणों को लागू करने की टाइमलाइन क्या होगी। 28 सितंबर की सुनवाई- FSSAI ने नोटिफिकेशन जारी करने के लिए 4 महीने, उस पर सुझाव के लिए 60 दिन और कंपनियों को अपनाने के लिए 365 दिन की मोहलत देने की बात कही। इसके बाद FSSAI ने खाने-पीने के पैकेट पर वॉर्निंग लेबल लगाने का नियम 2 फेज के बजाए 1 फेज में लागू करने की बात कही। कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया है। फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से जुड़े जरूरी सवाल-जवाब सवाल 1: क्या कुछ खाद्य पदार्थों को इस लाल लेबल से छूट भी मिली है? जवाब: हां, कुछ चुनिंदा कैटगरी को इससे बाहर रखने का प्रस्ताव है। सिंगल-इंग्रीडिएंट (सिर्फ एक सामग्री वाले) प्रोडक्ट्स और ऐसे पदार्थ जो प्राकृतिक रूप से ही फैट, शुगर या नमक से भरपूर होते हैं, उन्हें छूट मिलेगी। उदाहरण के लिए शुद्ध घी, खाद्य तेल, साधारण नमक, चीनी, गुड़ और शहद को इस फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग से छूट दी जाएगी। सवाल 2: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्या है? जवाब: फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) वह लेबल है, जो किसी फूड प्रोडक्ट के पैकेट के आगे के हिस्से में लिखा रहता है। इसमें खाने के मेन इंग्रीडिएंट्स जैसे शुगर, नमक और फैट की जानकारी को आसान और जल्दी समझ आने वाले तरीके से दिखाया जाता है। इसका मकसद ये है कि ग्राहक तुरंत समझ सके कि वो जो फूड खरीद रहा है, वह स्वास्थ्य के लिए कितना सही है। ये जानकारी पैकेट के बैक पर लिखे लंबे‑चौड़े न्यूट्रिशनल फैक्ट्स से अलग होती है। इसमें सिर्फ जरूरी जानकारी को सरल ग्राफिक्स या रंगों के जरिए दिखाया जाता है। सवाल 3: अभी पैकेज्ड पर फूड से जुड़ी न्यूट्रिशनल जानकारी कहां लिखी होती है? जवाब: यह आमतौर पर पैकेज्ड फूड के पीछे या किनारे पर एक टेबल के फॉर्म में लिखी होती है। यह जानकारी प्रोडक्ट के 100 ग्राम, 100 मिलीलीटर या हर सर्विंग में मौजूद न्यूट्रिशनल वैल्यू जैसे- कैलोरी, फैट, प्रोटीन, शुगर और सोडियम की मात्रा बताती है। सवाल 4: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से क्या पता चलता है? जवाब: फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग से पता चलता है कि फूड हेल्दी है या अनहेल्दी। उसमें कितनी कैलोरी, शुगर, नमक और फैट है और क्या वह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें– सवाल 5: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ क्यों जरूरी है? जवाब: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ इसलिए जरूरी है ताकि लोग पैकेज्ड फूड खरीदते समय जल्दी और स्पष्ट रूप से उसके हेल्थ इम्पैक्ट को समझ सकें। इससे उनके लिए हेल्दी ऑप्शन्स चुनना आसान हो जाएगा और अनहेल्दी फूड के अधिक सेवन को रोका जा सकेगा। सवाल 6: ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ से हमें क्या फायदा होगा? जवाब: फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग का मकसद न्यूट्रिशन की जटिल जानकारी को सरल बनाना है, ताकि ग्राहक खरीदते समय ही फैसला ले सके और अनहेल्दी फूड खाने से बच सकें। नीचे दिए ग्राफिक से इसके फायदे समझिए- सवाल 7: सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को लोगो का निर्देश क्यों दिया? जवाब: देश में लाइफस्टाइल बीमारियां तेजी से बढ़ रही है। इसकी बड़ी वजह अनहेल्दी खान-पान है। पैकेज्ड और अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड में मौजूद अधिक शुगर, नमक और फैट की मात्रा इन बीमारियों का बड़ा कारण बन रही है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI से कहा है कि वह पैकेज्ड फूड पर ‘फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग’ लागू करने पर गंभीरता से विचार करे, ताकि लोग खरीदते समय ही संभावित हेल्थ रिस्क समझ सकें। ग्राफिक से समझते हैं कि भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों की स्थिति कितनी गंभीर है- अब समझें सैचुरेटेड और अनसैचुरेटेड फैट क्या है

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